उत्तराखंड राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूरे हो गए है। इस वर्ष हम रजत जयंती मना रहे है। देर से ही सही पर केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर पहाड़ों के विकास के लिए कुछ ठोस योजनाएं धरातल पर उतरने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार अब राज्य के विकास रथ को तेजी से आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बढ़ती पलायन की समस्या को लेकर अब एक नई उम्मीद जग गई है। मैट्रो रेल परियोजना को रिवर्स पलायन की दिशा में एक बड़े मील का पत्थर माना जा रहा है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का कार्य वर्ष 2027-28 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसके पूरा होने पर चमोली, रूद्रप्रयाग, पौड़ी और टिहरी जैसे सीमांत जनपद सीधे मैट्रो रेल से जुड़े जाएंगे। इससे इन जिलों की आवाजाही आसान होने के साथ पर्यटन और व्यापार को नई गति मिलने की उम्मीद है। इसी तरह हल्द्वानी-बागेश्वर रेल परियोजना से कुमाऊं क्षेत्र के अल्मोडा, पिथौरागढ़, चंपावत और बागेश्वर जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के पूरा होने पर चमोली से ऋषिकेश, हरिद्वार और राजधानी देहरादून की दूरी मात्र 1 घंटे 30 मिनट में तय की जा सकेगी। यात्रा भाडा कम होगा। शिक्षा के लिए बच्चे रोजाना गांव से हरिद्वार, ऋषिकेश या देहरादून जाकर पढ़ाई कर सकेंगे और उसी दिन वापस लौट पाएंगे। वहीं बुज़ुर्ग और बीमार लोग भी अपनी आवश्यक चिकित्सा जांच के लिए रोजाना देहरादून आ जा सकेंगे। रोजगार से जुड़े लोग अपनी आजीविका के लिए रोजाना मैदानी जिलों में आकार उसी दिन वापस जा सकेंगे। यहां तक कि पहाड़ों में जरूरी सामान लाना ले जाना भी सुगम होगा। गांव में घर बनाना आसान होगा। सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी। फिर जरूरत नहीं रहेगी ऋषिकेश, हरिद्वार, देहरादून शहरों में किराए का कमरा लेने की, अपना घर, आशियाना बनाने की। मैदानी क्षेत्रों में बसे लोग फिर अपने घर गांव की तरफ लौटेंगे। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के 11 प्रमुख स्टेशनों पर स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, वाहन चालकों को अच्छा रोजगार मिलेगा। पर्यटन और व्यापार बढेगा। उजड़े घर-खेत खलियान फिर से लहलहाएंगे।
मैट्रो रेल परियोजना से आने वाले वर्षाे में चारधार यात्रा की रफ्तार बढेगी। चारों धाम की यात्रा आसान होगी। स्थानीय लोगों को अच्छा रोजगार मिलेगा और आजीविका की तलाश में लोगों को अपना घर-गांव छोड मैदानी क्षेत्रों में नहीं जाना पडेगा।
अब राज्य सरकार को चाहिए कि वो पहाड़ी जिलों में अभी से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दें। हवा हवाई जुमलों को छोड़ स्थापना सुविधाओं का तेजी से विकास के लिए योजनाबद्व तरीके से काम करें। बुद्वीजीवी लोगों एवं सरकारी मशीनरी का सदुपयोग करें। राजनेता अपनी रोटी सेकना छोड़ योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए पूरी प्रतिबद्वता के साथ मिलजुल कर काम करें, तो पहाड़ी जिलों में बडे पैमाने पर रिवर्स पलायन संभव होगा। बुजुर्गाे के छलकते आंसू थमेंगे। मैदानी जिलों में राहत तो पहाडी जिलों में खुशहाली लौटेगी। पहाडी संस्कृति फिर से जीवंत होगी।
निश्चित तौर पर मेट्रो रेल परियोजना ने एक उम्मीद जगाई है। अगर सुविधाएं पहुंची तो पहाड़ छोड़ना नही गांव लौटना बेहतर विकल्प होगा। हमारे पूर्वज एवं राज्य आंदोलनकारियों ने जिस ध्येय से पहाड़ी उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना की गई थी, उसे साकार करने का सपना सच होगा।
उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों से मैदानों की ओर बढ़ रहा पलायन आज की तरीख में एक गंभीर सामाजिक आर्थिक संकट का रूप ले चुका है। यू तो पलायन को रोकने के लिए सरकारें भरसक कोशिशें करती रही है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं अभाव में आज भी पहाड़ों से पलायन चरम पर है। स्थिति यह है कि गांव के गांव विरान हो गए है। खेत खलियान बंजर सब पडे है। पहाड़ों में बुजुर्गाे के आंखों से बहते आंसू, विरान बंजर पडे खेत-खलियानों का दर्द बयां कर रहे है। हालांकि वर्ष 2019-20 में देश में फैली भीषण कोरोना महामारी में प्रवासी लोगों ने जरूर अपने घर-गांव का रूख किया, लेकिन कोरोना का प्रभाव कम होते ही एक बार फिर से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की तलाश में प्रवासी अपने घर-गांव छोड़ शहरों की ओर पलायन कर गए। लेकिन अब पहाड़ों में मैट्रो रेल एक उम्मीद की किरण दिख रही है।
……..अस्था नेगी
गांव-शहर की दूरी खत्म, पहाड़ में मैट्रो से लौटेगी रौनक
रिवर्स पलायन की आहटः फिर से मुस्कुराएंगे पहाड़
25
